Ajmer Sharif: अजमेर शरीफ के नीचे शिव मंदिर होने का दावा: क्या है सच?

Ajmer Sharif: अजमेर शरीफ, जो कि हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब और Cultural विरासत का प्रतीक है, Ajmer Sharif एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गया है। हाल ही में, सिविल अदालत ने यह याचिका स्वीकार की है कि अजमेर शरीफ के नीचे शिव मंदिर होने की जांच कराई जाए। ये मामला न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को भड़काता है बल्कि 1991 के Places Of Worship एक्ट की भी अनदेखी करता है।

अजमेर शरीफ और 800 साल पुराना हिंदुस्तान का इतिहास

अजमेर शरीफ की ऐतिहासिक महत्ता

Ajmer Sharif Dargah, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मज़ार है, जो सूफीवाद और सामुदायिक सौहार्द्र का प्रतीक है।

  • 800 साल पुराना इतिहास: इस दरगाह ने न सिर्फ मुस्लिम बल्कि हिंदू शासकों की भी श्रद्धा पाई है।
  • धार्मिक सौहार्द्र का प्रतीक: जयपुर के महाराज जैसे कई हिंदू राजाओं ने यहां चढ़ावा चढ़ाया है।

हाल के विवाद

ajmer sharif and shive tample

हाल ही में, हिंदू सेना के अध्यक्ष Vishnu Gupta ने अदालत में याचिका दाखिल की, जिसमें दावा किया गया कि अजमेर शरीफ दरगाह के नीचे शिव मंदिर है।

  • आधार: 1911 में लिखी गई हरबिलास शारदा की किताब अजमेर: हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव और कुछ जैन मंदिर के अवशेष होने की बात।
  • अदालत का आदेश: Civil Court ने मामले को सुनने सच मानते हुए Ministry of, Dargah समिति, और ASI को नोटिस भेजा है।
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Places of Worship Act 1991

एक्ट का उद्देश्य

1991 में संसद ने ये Act passe किया था ताकि भारत में धार्मिक स्थलों के मूल स्वरूप को बनाए रखा जा सके।

  1. 15 अगस्त 1947 को धार्मिक स्थलों का जो स्वरूप था, उसे बदलने की इजाज़त नहीं।
  2. Act कानूनों का उल्लंघन करने पर 3 साल की कैद और जुर्माने को कहा गया था।

क्यों हो रही है अनदेखी?

Gyanvapi Masjid से लेकर Shahi Jama Masjid और अब Ajmer Sharif तक, एक के बाद एक मामले चर्चा में आ रहा है। पूर्व चीफ Justice DY Chandrachud द्वारा ज्ञानवापी मामले में सर्वे की अनुमति के बाद कई निचली अदालतें इसी तरह के आदेश दे रही हैं।

विवादों में अजमेर शरीफ

दरगाह कमेटी का विरोध

अजमेर दरगाह कमेटी ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा:

  • झूठे दावे: कमेटी के मोताबिक, यह सस्ती लोकप्रियता पाने की कोशिश है।
  • 800 साल का इतिहास: क्या कुछ किताबों के हवाले से इतने पुराने इतिहास को नकारा जा सकता है?

मोहन भागवत और दूसरे लोगों का रिएक्शन

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने भी बयान दिया था कि हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग ढूंढना समाज के लिए अच्छा नहीं।

  • उन्होंने कहा, “हमें झगड़े बढ़ाने के बजाय समझौते की ओर बढ़ना चाहिए।”

Conclusion:

Places of Worship Act 1991 की अनदेखी से धार्मिक जगहों को खतरा हो सकता है। 800 साल पुराने इतिहास और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक को बचाना हमारी जिम्मेदारी है।

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